भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से विरासत और अल्पसंख्यक भाषाओं के संरक्षण के प्रयासों को मजबूत कर रहा है, जिसमें प्रारंभिक बौद्ध ग्रंथों की प्राचीन भाषा पाली पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की डिजिटल इंडिया “भाषिणी” पहल के अंतर्गत दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में “पाली भाषा संरक्षण और डिजिटल कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकास” विषय पर एक कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यक्रम का आयोजन बौद्ध अध्ययन के उन्नत अध्ययन केंद्र के सहयोग से किया गया।
इस पहल का उद्देश्य पाली भाषा के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डिजिटल भाषा उपकरण विकसित करना है। सीमित डिजिटल डाटा और भाषाई संसाधनों के कारण पाली को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में “कम संसाधन वाली भाषा” माना जाता है। कार्यशाला में डाटा सेट निर्माण, पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण, ऑडियो संग्रह, भाषाई सत्यापन और विश्वसनीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल विकसित करने के लिए सामुदायिक भागीदारी पर चर्चा हुई।
अमिताभ नाग ने भारतीय भाषाओं में ज्ञान प्रणालियों और डिजिटल सेवाओं की पहुँच बढ़ाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने उच्च गुणवत्ता वाले डाटा सेट विकसित करने के लिए शैक्षणिक संस्थानों और भाषा समुदायों के सहयोग के महत्व पर जोर दिया।
कार्यशाला में “भाषिणी” के कई भाषा प्रौद्योगिकी उपकरणों का भी प्रदर्शन किया गया, जिनमें पाठ अनुवाद के लिए “अनुवाद”, वाणी आधारित अनुवाद के लिए “वाणी अनुवाद”, दस्तावेज़ अनुवाद के लिए “लेखा अनुवाद” और बहुभाषी वीडियो रूपांतरण के लिए “चित्र अनुवाद” शामिल थे। “भाषिणी” मोबाइल एप्लिकेशन और “भाषा दान” प्लेटफॉर्म का भी प्रदर्शन किया गया, जो रियल-टाइम अनुवाद और समुदाय आधारित भाषा डाटा योगदान को समर्थन प्रदान करते हैं।
अधिकारियों ने कहा कि यह पहल भारत में समावेशी बहुभाषी कृत्रिम बुद्धिमत्ता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने तथा डिजिटल नवाचार के माध्यम से सांस्कृतिक और विरासत भाषाओं के संरक्षण के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।